समंदर की लहरें आज भी उसी तरह उठ रही थीं…
लेकिन उस रात के बाद से जैसे वक्त वहीं रुक गया था।
तीन साल बीत चुके थे।
तीन साल…
मगर सिधार्थ की जिंदगी में एक दिन भी आगे नहीं बढ़ा था।
वह आज भी उसी जगह खड़ा था, जहाँ से उसने आखिरी बार अपनी पत्नी जान्हवी को देखा था।
एक तूफानी रात…
तेज हवाएँ…
बेकाबू लहरें…
और फिर—
जान्हवी का समंदर की गहराइयों में गिर जाना।
उस दिन के बाद किसी को नहीं पता था कि जान्हवी के साथ क्या हुआ।
लेकिन सिधार्थ ने कभी यह मानने से इनकार कर दिया कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही।
लोग कहते थे—
"साहब, तीन साल हो गए हैं… अब आपको सच स्वीकार कर लेना चाहिए।"
लेकिन सिधार्थ हर बार सिर्फ एक ही बात कहता—
"मेरी पत्नी मरी नहीं है।"
और अगर कोई उसके सामने जान्हवी की मौत का जिक्र करता, तो उसकी आँखों में ऐसा तूफान उठता कि सामने वाला दोबारा कुछ कहने की हिम्मत नहीं करता।
उस रात भी सिधार्थ अपनी हवेली की सबसे बड़ी खिड़की के पास खड़ा था।
हाथ में वही पुरानी अंगूठी थी…
जो जान्हवी ने उसकी उंगली में शादी के दिन पहनाई थी।
बाहर बारिश हो रही थी।
सिधार्थ ने धीरे से आँखें बंद कीं।
"जान्हवी…"
उसकी आवाज़ में पहली बार उस खतरनाक माफिया की जगह एक टूटे हुए पति की आवाज़ थी।
"तीन साल हो गए हैं।"
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"सब कहते हैं कि मैं पागल हो गया हूँ।"
उसने अंगूठी को देखा।
"लेकिन मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि तुम मेरे लिए सिर्फ मेरी पत्नी नहीं थीं… तुम मेरी पूरी दुनिया थीं।"
कुछ पल वह चुप रहा।
फिर उसकी नजर हवेली के मुख्य दरवाजे पर टिक गई।
"देखो… मैंने आज भी दरवाजा बंद नहीं करवाया।"
उसकी आँखें नम हो गईं।
"क्योंकि मुझे लगता है किसी भी वक्त तुम उस दरवाजे से अंदर आओगी और मुझसे कहोगी…"
वह जान्हवी की आवाज़ की नकल करने की कोशिश करते हुए धीमे से बोला—
"सिधार्थ, तुमने मेरा इंतजार करना छोड़ा नहीं?"
उसके होंठों पर दर्द भरी मुस्कान आई।
"और मैं तुमसे कहूँगा…"
उसने गहरी साँस ली।
"मैंने इंतजार करना सीखा ही कब था, जान्हवी?"
अचानक पीछे से आवाज आई—
"साहब…"
सिधार्थ ने पलटकर देखा।
उसका पुराना वफादार राघव खड़ा था।
"क्या है?"
"साहब, रात बहुत हो गई है। आप कुछ खा लीजिए।"
सिधार्थ की नजर फिर दरवाजे पर चली गई।
"भूख नहीं है।"
"लेकिन साहब आपने सुबह से कुछ नहीं खाया।"
"मैंने कहा ना, भूख नहीं है।"
राघव चुप हो गया।
फिर हिम्मत करके बोला—
"साहब… आप कब तक इंतजार करेंगे?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सिधार्थ धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ा।
"जब तक मेरी साँस चल रही है।"
राघव की आँखें झुक गईं।
सिधार्थ ने आगे कहा—
"तुम्हें पता है राघव…"
"जी साहब।"
"दुनिया के लिए मैं सिधार्थ हूँ।"
उसने हल्की हँसी के साथ कहा—
"माफिया सिधार्थ। जिसके नाम से लोग डरते हैं। जिसके सामने लोग सिर झुकाते हैं।"
फिर उसकी आवाज टूट गई।
"लेकिन जान्हवी के सामने मैं सिर्फ उसका पति था।"
राघव ने कुछ कहना चाहा।
सिधार्थ ने रोक दिया।
"नहीं। आज मुझे बोलने दो।"
वह कुर्सी पर बैठ गया।
"तीन साल पहले जब वह समंदर में गिरी थी ना… उस दिन मैंने भगवान से सिर्फ एक चीज मांगी थी।"
"क्या?"
"मेरी जिंदगी ले लो… लेकिन मेरी जान्हवी मुझे वापस दे दो।"
उसने अपनी मुट्ठी कस ली।
"भगवान ने मेरी बात नहीं सुनी।"
राघव की आँखों में भी आँसू आ गए।
"साहब… शायद—"
"शायद क्या?"
सिधार्थ अचानक गरज उठा।
"शायद वो नहीं रही?"
राघव चुप रहा।
सिधार्थ ने अपनी आवाज धीमी की।
"नहीं राघव।"
"मेरी जान्हवी जिंदा है।"
"मुझे यकीन है।"
राघव ने पूछा—
"लेकिन आपको इतना यकीन कैसे है?"
सिधार्थ कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
"क्योंकि जब कोई अपना हमेशा के लिए चला जाता है ना… तो दिल उसे महसूस करना बंद कर देता है।"
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
"लेकिन मेरा दिल आज भी कहता है कि जान्हवी कहीं ना कहीं है।"
"बस उसे मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही।"
उसने खिड़की से बाहर देखा।
"या शायद… वो भी मेरा इंतजार कर रही है।"
उसी समय हवेली के बाहर बिजली चमकी।
सिधार्थ की नजर अचानक समुद्र की तरफ चली गई।
दूर…
बहुत दूर…
समंदर की लहरें चाँदनी में चमक रही थीं।
उसने फुसफुसाकर कहा—
"जान्हवी…"
फिर जैसे उसे लगा कि हवा में कोई आवाज आई है।
"सिधार्थ…"
वह तुरंत खड़ा हो गया।
"जान्हवी?"
राघव चौंक गया।
"साहब?"
सिधार्थ तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"तुमने सुना?"
"क्या?"
"उसने मुझे पुकारा।"
"किसने?"
सिधार्थ ने दरवाजा खोल दिया।
बाहर सिर्फ बारिश थी।
कोई नहीं था।
उसने चारों तरफ देखा।
फिर धीरे से मुस्कुराया।
"शायद मेरा वहम था।"
राघव ने कहा—
"साहब, आपको आराम की जरूरत है।"
सिधार्थ ने उसकी तरफ देखा।
"आराम?"
"जी।"
"जिस आदमी की पत्नी उससे दूर हो… उसे नींद कहाँ आती है राघव?"
राघव के पास कोई जवाब नहीं था।
सिधार्थ वापस कमरे में आया।
टेबल पर जान्हवी की तस्वीर रखी थी।
उसने तस्वीर उठाई।
"तुम्हें याद है जान्हवी…"
"तुम हमेशा कहती थीं कि मैं बहुत गुस्सैल हूँ।"
वह तस्वीर से बात करते हुए मुस्कुराया।
"तुम कहती थीं कि मेरे चेहरे पर हमेशा गुस्सा रहता है।"
उसकी आँखों में आँसू थे।
"और फिर तुम मेरा चेहरा पकड़कर कहती थीं—"
"मुस्कुराया करो सिधार्थ।"
वह कुछ पल तस्वीर को देखता रहा।
"देखो… आज भी मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ।"
उसने होंठों पर मुस्कान लाई।
लेकिन आँखें रो रही थीं।
"लेकिन तुम नहीं हो ना…"
"इसलिए मुस्कान भी झूठी लगती है।"
अचानक उसकी नजर तस्वीर के पीछे रखे एक छोटे से कागज पर पड़ी।
उसने कागज उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"हर कहानी का अंत वही नहीं होता जो आँखों से दिखाई देता है।"
सिधार्थ कुछ पल उस लाइन को देखता रहा।
उसकी आँखों में अचानक पुरानी आग लौट आई।
"राघव!"
राघव दौड़कर आया।
"जी साहब?"
"ये कागज किसने रखा?"
"मुझे नहीं पता साहब।"
"हवेली में आज कौन-कौन आया था?"
"कोई नहीं साहब।"
सिधार्थ ने कागज को पलटा।
पीछे एक तारीख लिखी थी।
वही तारीख…
जिस दिन जान्हवी समंदर में गिरी थी।
सिधार्थ का दिल जोर से धड़कने लगा।
"ये कैसे हो सकता है?"
राघव ने पूछा—
"क्या हुआ साहब?"
सिधार्थ ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया।
राघव पढ़कर सन्न रह गया।
"साहब…"
सिधार्थ ने धीमे से कहा—
"तीन साल से मैं जान्हवी को ढूँढ रहा हूँ।"
उसकी मुट्ठी बंद हो गई।
"लेकिन शायद जान्हवी खुद मुझे कोई निशान दे रही है।"
"साहब, अगर ये किसी की चाल हुई तो?"
सिधार्थ की आँखें खतरनाक हो गईं।
"तो जिसने भी मेरी जान्हवी को मुझसे दूर किया है…"
वह रुका।
"उसे दुनिया के किसी कोने में छिपने की जगह नहीं मिलेगी।"
राघव ने पूछा—
"और अगर जान्हवी सच में जिंदा हुई तो?"
सिधार्थ की आँखों में आँसू आ गए।
"तो मैं उसे लेने जाऊँगा।"
"चाहे समंदर की आखिरी गहराई तक क्यों ना जाना पड़े।"
उसने जान्हवी की तस्वीर अपने सीने से लगा ली।
"मैंने तुमसे वादा किया था ना जान्हवी…"
"कि चाहे पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो जाए…"
"मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगा।"
उसने आँखें बंद कीं।
"तुम जहाँ भी हो…"
"जिस हाल में भी हो…"
"बस एक बार मेरी आवाज सुन लेना।"
उसकी आवाज काँप गई।
"मैं आज भी तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"
फिर वह हवेली के दरवाजे की तरफ देखने लगा।
"और ये दरवाजा…"
"आज भी तुम्हारे लिए खुला है।"
बाहर बारिश तेज हो चुकी थी।
समंदर की लहरें भी जैसे किसी अनकहे राज को अपने भीतर छुपाए थीं।
और उसी वक्त…
समंदर के दूसरी तरफ…
एक अनजान शहर के छोटे से कमरे में एक लड़की खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में सिधार्थ था।
लड़की ने तस्वीर को देखते हुए धीरे से कहा—
"सिधार्थ…"
उसकी आवाज काँप रही थी।
"तुम आज भी मेरा इंतजार कर रहे हो?"
उसने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे माफ कर देना।"
एक आँसू उसके गाल पर गिरा।
"मैंने तुम्हें छोड़ना नहीं चाहा था।"
"मैं मजबूर थी।"
वह तस्वीर को सीने से लगा लेती है।
"लेकिन अब मैं वापस आऊँगी।"
उसने धीरे से कहा—
"तुम्हारी जान्हवी वापस आएगी।"
उधर हवेली में सिधार्थ अचानक उठ खड़ा हुआ।
जैसे किसी ने उसके कानों में कुछ फुसफुसाया हो।
उसने दरवाजे की तरफ देखा।
उसके होंठों से सिर्फ एक शब्द निकला—
"जान्हवी…"
और पहली बार तीन साल बाद…
उसके चेहरे पर उम्मीद दिखाई दी।
क्योंकि शायद…
इंतजार खत्म होने वाला था।
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Jinhone iska first part nhi padha vo iska first' part partilipi par jaakar padh sakte hai
Meri partilipi id hai " The Lost fairy girl"
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